Dr. Akhtar Khatri

लग रहा हैं

बसा बसाया शहर, अब बंजर लग रहा हैं,
चारो ओर उदासीयों का मंज़र लग रहा हैं ।

जाने अनजाने से लोग क़ातिल हो जैसे,
हर एक कि सांसों में खंजर लग रहा है ।

बड़ी मुश्किलों से बनाया था बरसों में,
काटने को दौड़ता हुआ घर लग रहा है ।

कौन बचेगा, कैसे बचेगा, ख़ुदा ही जाने,
हर कोने में बिखरा सा ज़हर लग रहा है ।

ईमान कमज़ोर है क्या हमारा ? ‘अख़्तर’,
इसी लिए हर लम्हा हमें डर लग रहा है ।

#अख़्तर_खत्री

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