Dr. Akhtar Khatri

मज़दूर

मज़दूर देखो आज कैसा प्रवासी हो गया,
बिना पानी, टूटी नाव का खलासी हो गया।

भरोसा टूटा, टूटा है अब सब्र का बांध भी,
खुद के घर लौटना कैसे सियासी हो गया।

ना खाना, ना पानी, ना ही पैसा है पास में,
भूख, प्यास का एहसास शिकारी हो गया।

कमा कर देते थे तो अपने लगते थे ये सब,
अब कोई यू पी का, कोई बिहारी हो गया।

-अख़्तर खत्री

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