Mythology

भस्मी

भस्मी। 

आध्यात्म मे भस्मी को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त है। हम देखते हैं कि मंदिरों मे हम भस्मी को प्रसाद से ज्यादा महत्व देते है। जहां अगरबत्तियां जलती है वहां से हम थोडी सी भस्मी प्रसाद रूप मे लेते है और उसी का तिलक भी लगाते है।

क्यो!!!? क्यो कि भस्मी अग्नि द्वारा दिया गया साक्षात प्रसाद है, आशीर्वाद है। हम जितने भी भोग लगाते है वे हमारी श्रद्धा स्वरूप वायुतत्व के माध्यम से ईश्वर तक पहुंचते है।  लेकिन अग्नि को अर्पित किये गये समस्त पदार्थ अग्नि देवता स्वयं साक्षात आ कर स्वीकार करते है।

देवताओं के भोजन को हवि कहा गया है, ओर हवि प्रदान करने का सर्वोत्तम माध्यम है हवन। जब हम देवताओं का नाम ले कर हवन मे आहुतियां छोडते है तो उसे लेने संबंधित देवी दैवता अवश्य ही आते है, हवन से प्रसन्न भी होते है।

हमारा मानस,हमारी संस्कृति हमारी सभ्यता हिंदू धर्म कै डिएन ए मे रची बसी है। हम सभी इसी भावनाओ से पोषित रहते है कि भोग लगाये गये पदार्थ हमे शेष बच कर प्रसाद के रप मे मिले जिस से कि हम मे दैवीय गुण पनप सके एक तरह से हम देवताओं की झूठन खाने को लालायित रहते है। यहां झूठन शब्द को आध्यात्मिक रूप से समझना चाहिए।

हमारी दादियां नानियां खाना बनाने से पहलै थोडा सा आटा अग्नि को समर्पित करती थी जिस से कि अग्नि देवता भी तृप्त हो और भोजन बनने तक चैतन्य भी रहे। इसी कारण जब हवन मै देवताओं के नाम से छोडी गयी आहुतियां हमें प्रसाद रूप मे भस्मी के माध्यम से प्रसाद के प्रति प्रसाद के रूप मे प्राप्त होती है।

भस्मी नकारात्मकता का नाश करती है, दिव्यता प्रदान करती है, चैतन्यता मे वृध्दि करती है, आस्था मे वृध्दि करती है। और सबसे बडी बात मन को संतोष, आनंद से भर देती है।

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