Dr. Akhtar Khatri

नहीं

चाहे आज तक मैंने तुजे कभी कहा नहीं,
डर तुजे खो देने का कभी मुझे लगा नहीं ।

लापरवाह तो हूँ ज़रा सा, मान लिया मैंने,
पर वो क़ीरदार है मेरा, मेरी ख़ता नहीं ।

ये तो तुम्हें भी पता ही होगा यक़ीनन की,
नाराज़ होता हूँ कभी कभी, पर बेवफ़ा नहीं ।

हर सांस, हर धड़कन सिर्फ़ तुम्हारी ही है,
तुम्हारे अलावा जीने की कोई वजा नहीं ।

कभी ना दिखूं तो ढूंढना नहीं ‘अख़्तर’ को,
मिलूंगा तुम्हारे दिल में, और कोई जगा नहीं ।

-अख़्तर खत्री

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